मिस तिब्बत तेनजिंग सांज्ञी को सातवें आसमान पर होना चाहिए था, पर इसका उल्टा क्यों हो रहा है?

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तेनजिंग सांज्ञी तकरीबन एक महीने पहले मिस तिब्बत चुनी गई हैं. उनके लिए बीते 27 दिन अबतक के सबसे हंसी-खुशी वाले दिन होने चाहिए थे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. 21 साल की यह लड़की तिब्बती महिलाओं के लिए एक आदर्श बननी चाहिए थी लेकिन सांज्ञी सोशल मीडिया पर अपने ही समुदाय के लोगों के निशाने पर हैं.
इसका कारण यह है कि वे तिब्बती भाषा – यू त्सांग, नहीं जानतीं. उनके बारे में सोशल मीडिया पर आई एक टिप्पणी कहती है, ‘यदि किसी को तिब्बती भाषा का बुनियादी ज्ञान भी नहीं है तो उसे तिब्बती महिलाओं के सौंदर्य का प्रतिनिधि बनने की अनुमति कैसे दी जा सकती है. यह मजाक है और पूरी तरह गलत है…’ फेसबुक पर डोल्मा सचु मे-लुंग लिखती हैं , ‘टूटी-फूटी और मिलावट वाली भाषा तुम को कहीं नहीं ले जाएगी… यदि तुम तिब्बत के लोगों की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सकतीं तो तुम मिस तिब्बत नहीं हो…’
इस तरह की आलोचनाओं की बाढ़ आने के बाद संज्ञी को अपील करके बताना पड़ा कि वे एक तिब्बती शरणार्थी की बेटी हैं और उस माहौल में पली-बढ़ी हैं जहां उनका वास्ता तिब्बती बोलने वालों से नहीं पड़ा. फिलहाल उनकी अपील से सभी लोग सहमत हो गए हों ऐसा नहीं है लेकिन इस बार की मिस तिब्बत प्रतियोगिता से जुड़ा एक विवाद जरूर खत्म हो गया है, और शायद तबतक के लिए जबतक यह प्रतियोगिता दूसरी बार फिर आयोजित नहीं की जाती.
तिब्बती मूल की लड़कियों के लिए मैक्लॉयडगंज में हर साल मिस तिब्बत प्रतियोगिता का आयोजन होता है. हिमाचल प्रदेश का यह शहर तिब्बत की निर्वासित सरकार का मुख्यालय है. यहां 2002 से सौंदर्य प्रतियोगिता आयोजित हो रही है और बिना विवाद के आज तक एक भी आयोजन नहीं हुआ है.
यह सौंदर्य प्रतियोगिता लॉब्सेंग वांग्याल ने शुरू करवाई थी. धर्मशाला में रहने वाले इस फोटो जर्नलिस्ट ने जब अपने समुदाय के बीच मिस तिब्बत प्रतियोगिता के आयोजन का विचार रखा तो बड़े-बुजुर्गों ने उन्हें बुरी तरह झिड़का. इनका कहना था कि इससे मैक्लियॉडगंज की बदनामी होगी, जबकि उसे समुदाय के आध्यात्मिक गुरू दलाई लामा की उपस्थिति की वजह से बेहद पवित्र माना जाता है.
तिब्बती समुदाय के वरिष्ठ लोगों की चिंताएं अपनी जगह जायज थीं कि क्यों इस प्रतियोगिता में लड़कियों को बिकिनी भी पहननी थी. तिब्बती महिलाएं परंपरागत रूप से घुटनों से नीचे तक की स्कर्ट – चुबा और पूरी बांहों का ब्लाउज पहनती हैं. इस समुदाय में पश्चिमी देशों के तंग परिधानों को अच्छा नहीं समझा जाता. हालांकि इसके बाद भी वांग्याल अपनी योजना पर कायम रहे.
इस आयोजन के पीछे वांग्याल का तर्क है कि यह सौंदर्य प्रतियोगिता खूबसूरत लड़कियों का रैंप पर ठुमकते हुए चलनाभर नहीं है. उनके मुताबिक, ‘यह एक राजनीतिक आयोजन है जहां हम अपनी पहचान, संस्कृति और हमारी गौरवशाली परंपराओं का उत्सव मनाते हैं और इस आयोजन के जरिए बताते हैं कि हम एक देश हैं.’
इस आयोजन को अब तक 14 साल हो गए हैं लेकिन तिब्बती समुदाय के बीच अभी-भी इसे पूरी तरह मान्यता नहीं मिली है. तिब्बती समुदाय के एक स्त्रीवादी संगठन – तिब्बतन फेमिनिस्ट कलेक्टिव की सह-संस्थापक के सेंग सवाल उठाती हैं, ‘यह अपने आप में हास्यास्यपद नहीं है कि जिस आयोजन में मडजांग्समा – यानी बुद्धिमान, बहादुर और सही सीरत वाली महिला का चुनाव होना है उसकी टैग लाइन कहती है – ब्यूटी विद ब्रेन, लेकिन यहां आखिरी दिन तक ब्रेन की तरफ तो किसी का ध्यान ही नहीं जाता?’ यह तिब्बती समुदाय के सिर्फ एक व्यक्ति की राय नहीं है और इसी के चलते इस आयोजन को शुरुआत में काफी बुरी नजर से देखा जाता था. इन सालों में चार बार ऐसे भी मौके आए जब सौंदर्य प्रतियोगिता के लिए सिर्फ एक लड़की ने दावेदारी की और आखिरकार उसे ही मिस तिब्बत के ताज से नवाजा गया.
मिस तिब्बत को अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी भाग लेने भेजा जाता है और चीन की आपत्ति के चलते बीते सालों में कुछ विवाद भी हुए हैं. 2004 और 2007 में मिस तिब्बत को अंतर्राष्ट्रीय सौंदर्य प्रतियोगिताओं से आखिरी समय में नाम वापस लेना पड़ा क्योंकि उनकी उपस्थिति पर चीन ने एतराज जताया था. चीन का कहना था कि ये लड़कियां प्रतियोगिता के दौरान अपने नाम वाली कपड़े की जो पट्टी पहनती हैं उसमें मिस तिब्बत के बजाय मिस तिब्बत-चीन लिखा होना चाहिए. जब इन लड़कियों ने ऐसा करने से इनकार किया तो उन्हें प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं लेने दिया गया.
इस साल यांज्ञी के मिस तिब्बत चुने जाने पर उनको तिब्बती भाषा न आने से जुड़ा विवादभर चर्चा में नहीं है. तिब्बत के ‘डोनाल्ड ट्रंप’ कहे जाने वाले वांग्याल पर आरोप है कि उन्होंने अपनी पसंद की प्रतियोगी को जिताने के लिए नतीजों में हेरफेर की है.
इन विवादों के बावजूद इसबार की मिस तिब्बत सौंदर्य प्रतियोगिता एक मायने में अपेक्षाकृत ज्यादा सफल साबित कही जा सकती है. प्रतियोगिता के फाइनल में चार लड़कियां पहुंची थीं – मसूरी की डेंचिन वांग्मो, न्यूयॉर्क की तेनजिन डावा, कर्नाटक के बायलाकुप्पे की तेनजिन डिकी और मनाली की तेनजिन संज्ञी. इन प्रतियोगियों के साथ वांग्याल दलाई लामा का आशीर्वाद लेने भी पहुंचे थे और दलाई लामा के साथ उनकी तस्वीर सोशल मीडिया पर कई लोगों ने शेयर की थी. इसके चलते तिब्बती समुदाय में इसबार की सौंदर्य प्रतियोगिता का कुछ खास विरोध नहीं हुआ.
पांच जून को तिब्बतन इन्स्टिट्यूट ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स में मिस तिब्बत प्रतियोगिता का आयोजन हुआ था और इसे देखने के लिए तकरीबन 2000 हजार लोग जुटे थे. प्राकृतिक चिकित्सक-काउंसलर ऊषा डोभाल और एक योग शिक्षक सुनीता सिंह चारों राउंड की जज थीं. स्थानीय ज्वेलर ने मिस तिब्बत के लिए चांदी के ताज की व्यवस्था की थी साथ ही एक लाख रुपये का नकद ईनाम दिल्ली के एक तिब्बती व्यापारी की तरफ से प्रायोजित था.
संज्ञी के प्रतियोगिता जीतने के साथ ही उन्हें तिब्बती भाषा न आने का विवाद शुरू हो गया था. अपनी आलोचना के बाद संज्ञी की जिस अपील का जिक्र हमने ऊपर किया वह उन्होंने मिस तिब्बत वेबसाइट और अपने फेसबुक पेज पर की थी. इसमें तिब्बती भाषा न जानने की वजह बताते हुए वे लिखती हैं, ‘… मेरी भाषा से जुड़ी कमजोरियां मुझे कहीं से भी कम तिब्बती नहीं बनातीं.’
संज्ञी की इस पोस्ट के बाद समुदाय के कई लोग उनके बचाव में भी आए. इन लोगों का कहना था कि 20 साल से कम उम्र के ज्यादातर तिब्बती अलग-अलग स्थानों और मुश्किल परिस्थितियों में पलेबढ़े हैं. और इसलिए अपनी भाषा पर पकड़ न होने के लिए इन्हें जिम्मेदार ठहराना जायज नहीं है. ‘विश्व में हर कहीं, पलायन के साथ मातृभाषाओं पर खतरा बढ़ जाता है क्योंकि तब पलायन करने वाले लोग अन्य भाषाओं के प्रभाव में आते हैं.’ तिब्बत की निर्वासित सरकार की संसद के सदस्य ल्हाग्यारी नामग्याल डोलकर कहते हैं, ‘यही बात तिब्बती भाषा के ऊपर भी लागू होती है.’

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