तेलंगाना में 9 और जज निलंबित, विरोध में 200 जज सामूहिक अवकाश पर गए

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हैदराबाद। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बीच न्यायाधीशों के अस्थायी आवंटन के खिलाफ आंदोलन मंगलवार को उस समय और तेज हो गया जब उच्च न्यायालय ने अनुशासनहीनता के आधार पर निचली अदालत के नौ और न्यायाधीशों को निलंबित कर दिया और इसके विरोध में 200 न्यायिक अधिकारी 15 दिन के लिए सामूहिक अवकाश पर चले गये।
तेलंगाना जजेज एसोसिएशन ने कल ‘उच्च न्यायालय बंद’ का आह्वान किया है। इस घटनाक्रम से तेलंगाना सरकार और केन्द्र के बीच विवाद भी बढ़ गया। टीआरएस ने वर्ष 2014 के अविभाजित आंध्र प्रदेश से तेलंगाना को अलग बनने के बाद उच्च न्यायालय का विभाजन नहीं करने के लिए केन्द्र को जिम्मेदार ठहराया। उच्च न्यायालय की आज की कार्रवाई का विरोध करते हुए करीब 200 न्यायिक अधिकारियों ने आज से 15 दिन के लिए सामूहिक अवकाश पर जाने का फैसला किया।
उच्च न्यायालय ने सोमवार को दो न्यायाधीशों को निलंबित किया था। ‘तेलंगाना जजेज एसोसिएशन’ के बैनर तले सौ से अधिक न्यायाधीशों ने रविवार को गन पार्क से राजभवन तक जुलूस निकाला था और राज्यपाल को न्यायिक अधिकारियों के अस्थायी आवंटन के खिलाफ ज्ञापन सौंपा था। सत्तारूढ़ टीआरएस ने आज आरोप लगाया कि केन्द्र अब तक उच्च न्यायालय का विभाजन नहीं करके इस मुद्दे पर ‘असंवेदनशील’ है। टीआरएस की लोकसभा सदस्य के. कविता ने आरोप लगाया कि उनके पिता एवं तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव का इस मुद्दे पर दिल्ली में विरोध प्रदर्शन का प्रस्ताव भी है।
हालांकि केन्द्रीय विधि मंत्री डीवी सदानंद गौडा ने आज कहा कि तेलंगाना के लिए नये उच्च न्यायालय के गठन में केन्द्र की कोई भूमिका नहीं है। गौडा ने कहा कि इस मुद्दे पर राज्य सरकार द्वारा केन्द्र को जिम्मेदार ठहराना ‘अस्वीकार्य एवं बर्दाश्त से बाहर है।’ उन्होंने टीआरएस के इस आरोप को भी खारिज किया कि केन्द्र आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की तरफ से राजनीतिक दबाव में है।
गौडा ने कहा कि तेलंगाना के लिए नए उच्च न्यायालय का गठन मुख्यमंत्री और उस उच्च न्यायालय (आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के लिए यह साझा है, और जून 2014 में पूर्व राज्य के विभाजन के बाद जिसका विभाजन नहीं हुआ है) के मुख्य न्यायाधीश के हाथों में है।

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