सेंसर बोर्ड को खत्म कर फिल्म प्रमाणन की एक नई व्यवस्था बनाना जरूरी है

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सूचना और प्रसारण मंत्री अरुण जेटली की प्रतिक्रिया देखें तो फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ पर उठे विवाद का अंत यह हो सकता है कि इस फिल्म को हरी झंडी मिल जाए. जेटली का यह बयान भी स्वागत योग्य है कि मशहूर फिल्मकार श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में बनी एक समिति की सिफारिशों के आधार फिल्मों को सर्टिफिकेट देने की एक नई व्यवस्था का ऐलान जल्द ही किया जाएगा. खबरों के मुताबिक समिति ने अपनी सिफारिशों में कहा है कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड का ध्यान इस आधार पर फिल्मों के वर्गीकरण पर होना चाहिए कि 18 साल से कम उम्र के लोगों के लिए उन्हें देखना ठीक है या नहीं. समिति का कहना है कि बोर्ड को वयस्कों के मामले में नैतिकता के मापदंड करने का काम उन्हीं पर छोड़ देना चाहिए.

इस पूरे विवाद में मुख्य मुद्दा यही है. जब बोर्ड यह मांग करता है कि उड़ता पंजाब पर 89 जगह कैंची चलाई जाए तो इसका मतलब यह है कि वह फिल्म के प्रमाणन की जगह सेंसरशिप का काम कर रहा है. संस्था का काम यह नहीं होना चाहिए. सरकार का यह तय करना कि लोग क्या देखें और क्या नहीं, सोचने पर लगाम लगाने जैसी बात है. यह बात लोकतंत्र की मूल भावना से कहीं दूर खड़ी नजर आती है. यह सच है कि संविधान सरकार को अनुच्छेद 19 (1)(ए) में दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को राष्ट्रीय सुरक्षा से लेकर मित्र देशों के साथ संबंध बिगड़ने की आशंका तक कई आधारों पर सीमित करने की इजाजत देता है. लेकिन यह आशंका किसी फिल्म से पैदा हो सकती है या नहीं, यह तय करने का सबसे श्रेष्ठ आधार कोई फिल्म प्रमाणन संस्था नहीं हो सकती. यह काम राज्य सरकारों पर छोड़ा जा सकता है जो लोगों और उनके प्रतिनिधियों के प्रति कहीं सीधे तौर पर जवाबदेह होती हैं. सेंसरशिप या पुलिस का काम करने के बजाय प्रमाणन संस्था को अपना काम यहीं तक सीमित रखना चाहिए कि कौन सी फिल्म किस दर्शक वर्ग के लिए ठीक है.

इसके अलावा आदर्श स्थिति यह होगी कि प्रमाणन संस्था का नेतृत्व किसी ऐसे व्यक्ति के हाथ में होना चाहिए जिसकी सिनेमा या कला के दूसरे माध्यमों से जुड़े लोगों के बीच कुछ प्रतिष्ठा हो. ऐसा होगा तो प्रमाणन संस्था के वर्तमान मुखिया की संभावना समाप्त हो जाएगी. लेकिन दोष सिर्फ उन्हें ही क्यों दिया जाए? जिन्होंने उनको चुना था उन्हें समझदारी का परिचय देना चाहिए था.

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