पुस्‍तक समीक्षा : ज़िन्दगी के ज़ज्बातों से खनकती एक अनूठी गुल्लक

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आज जब हिंदी में साहित्य का अर्थ निरपवाद रूप से केवल कहानी, कविता और बहुत हुआ तो उपन्यास रचना ही रह गया है, ऐसे में मनीषा श्री की किताब ‘जिंदगी की गुल्लक’ इतना संतोष जरूर देती है कि हिंदी साहित्य के इस बासी से हो रहे माहौल में भी कुछ नया व ताज़ा करने की कोशिश पूरी तरह से मरी नहीं है। मनीषा की इस किताब का सबसे प्रमुख नयापन है, इसमे मौजूद ‘विधागत प्रयोग’।

ये किताब न तो पूरी तरह गद्य है और न ही पूरी पद्य। यह न तो कोई कहानी, कविता, निबंध आदि का संग्रह है और न ही उपन्यास, नाटक आदि की रचना; इसकी रचावट-बनावट कुछ यूं है कि इसमे कविता भी है और कहानी भी। यूं कह सकते हैं कि कहानियों की कविताएं या कविताओं की कहानियों का संग्रह है ये किताब। चूंकि कोई भी कविता पढ़ते समय पाठक उसके प्रति मन में अपने अनुसार एक कल्पना-चित्र बना लेता है कि ये कविता इस भाव को प्रदर्शित कर रही है। लेकिन, यह कत्तई जरूरी नहीं कि रचनाकार ने उस कविता की रचना उसी भाव में की हो। अब जैसे कि एक पेड़ पर यदि पांच लोग कविता लिखें तो यह तय है कि सबकी नहीं तो कईयों की कविताएं अलग होंगी। निष्कर्ष यह कि पेड़ एक ही है, पर उसके प्रति सबका नजरिया अलग-अलग है।
इसी तरह कोई रचनाकार रचना अपनी दृष्टि से करता है और पाठक उसे अपनी दृष्टि से समझता है, दोनों की दृष्टि एक भी हो सकती है और अलग भी, लेकिन मनीषा की इस किताब में कविताओं की कहानियां देकर इस समस्या को ही समाप्त कर दिया गया है, यानी कि अमुक कविता किस कारण से और किस भाव व मनोस्थिति में लिखी गई है, ये पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया गया है। पुस्तक का जो गद्य है, उसे संस्मरण और डायरी जैसी श्रेणियों में रखा जा सकता है। बाकी तो छंदमुक्त-अतुकांत कविता है ही।

यूं तो इस किताब का प्रत्येक अध्याय अपने आप में स्वतंत्र है, लेकिन जरा गहराई से अगर गौर करें तो यह स्पष्ट होता है कि स्वतंत्र से दिखने वाले ये अध्याय कहीं न कहीं एक दूसरे से क्रमवार ढंग से न केवल जुड़े हैं, बल्कि लेखिका को अपने अब तक के जीवन में मिले अनुभवों का क्रमवार विश्लेषण भी हैं।

इसी क्रम में किताब के कुछ प्रमुख अध्यायों पर एक संक्षिप्त नज़र डालें, तो इसका पहला अध्याय ‘शब्द’ किताब की वास्तविक भूमिका है। इसमें जीवन की आपा-धापी से कुछ समय मिलने पर लेखिका में लेखन की अन्तःप्रेरणा उत्पन्न होती है, और वो अपनी सबसे प्यारी सहेली यानी अपनी डायरी की तरफ मुड़ती है। दूसरे अध्याय में चीजें फ्लैशबैक में चली जाती हैं और एक बच्चे को जन्म देने जा रही लेखिका काफी पीछे शादी से पहले की आईआईटी में ऑल इण्डिया 20 रैंक लाने वाली एक छात्रा हो जाती है, जिसे तब उसके नाना समझाते हैं कि कामयाबियां कितनी भी बड़ी हों, कदम हमेशा जमीन पर ही रहने चाहिए और नाना की यही सीख लेखिका के इस अध्याय की कविता है – कदम जमीन पर रहें।

तीसरे अध्याय ‘जिंदगी’ में लेखिका आइआइटी मे अंतिम वर्ष में है, लेकिन आर्थिक मंदी के कारण प्लेसमेंट करने कोई कंपनी नहीं आ रही, जिस कारण बेहद हताश और परेशान है। वो काबिल है, लेकिन किस्मत के कारण उसे नौकरी नहीं मिल पा रही। तिस पर घर वालों की उम्मीदों का दबाव अलग है। इन तनावों में उलझा उसका दिमाग एक बारगी आत्महत्या जैसी चीज तक सोच लेता है। हताशा की इस हालत में जब फोन पर उसके पापा यह कहते हैं कि ‘पापा इज ऑलवेज विथ यू’ तो जैसे उसे ‘लाइफ टॉनिक’ मिल जाती है और जिंदगी फिर खूबसूरत लगने लगती है।
कुल मिलाकर ज़िन्दगी के उत्साह-उम्मीद-निराशा-तनाव आदि विविध गाढ़े-फीके रंगों और उन पर मनुष्य की प्रतिक्रियाओं का बाखूबी चित्रण इस अध्याय में हुआ है। ऐसे ही, 13वे अध्याय ‘कोशिश’ में दुर्घटना से पैर में फ्रैक्चर के बावजूद लेखिका अकेले ही खुद को और अपने छोटे-से बेटे को अपनी कोशिशों से संभालने की घटना का जिक्र कर कोशिश के महत्व और उसके बाद होने वाले संतोष को बाखूबी बयां की है, तो वही 14वें अध्याय ‘सपने’ में लेखिका ने अपने मां बनने के सपने और उसके पूरे होने में हुई जद्दोजहद का वर्णन करते हुए यही कहने की कामयाब कोशिश की है कि सपना कोई भी हो, उसके पूरा होने का एक सही वक़्त होता है और उसे तभी पूरा होना चाहिए।

इसी तरह आगे के कुछ अध्यायों जैसे ‘दहेज़’, ‘बेटी की मां’, ‘मां हूं, भगवान् नहीं’, आदि में लेखिका द्वारा बेटी या कि स्त्री के प्रति समाज के संकुचित दृष्टिकोण पर बेबाकी और तार्किकता के साथ अपनी बात कहने की काफी हद तक कामयाब कोशिश की गई है। ‘मां’ और ‘मेरे पापा’ जैसे अध्याय तो शीर्षक से ही स्पष्ट हैं कि लेखिका के अपने माता-पिता से समबन्ध के वर्णन को समर्पित हैं। फिर अन्धविश्वास, वक़्त, टुकड़े, असमंजस, नदी की कहानी, आदि में भी जीवन के विविध पहलुओं की मौजूदगी है।

इन सब में किताब का 12वां अध्याय ‘मै चुप थी’ सबसे बेहतरीन है। इसमें काम से थकी-हारी लेखिका जब अपने पति के पास जाती है तो वो खुद अपनी परेशानियों में उलझा है और लेखिका पर चिल्ला पड़ता है तथा गुस्से में उसके सभी पारिवारिक योगदानों को नकार देता है। लेखिका इन बातों का जवाब देने में पूर्णतः समर्थ है, लेकिन वो अपने रिश्ते को इस क्षणिक आवेश की भेंट नहीं चढ़ने देना चाहती, इसलिए चुप रहती है और अगली सुबह सबकुछ ठीक हो जाता है। लेकिन उसका यह भी कहना है कि आज तो मै चुप रही…“बस एक गुज़ारिश है कि समय पड़ने पर तुम भी मुझको सुनना, मेरे गुस्से को झेलना क्योंकि मेरे पास सिवा तुम्हारे कोई नहीं है जिसके सामने अपना दिल खोल सकूं।”

इस प्रकार अधिकांश समकालीन स्त्रीवादियों के लिए भी यह अध्याय पठनीय है कि सशक्त स्त्री के नाम पर उनके द्वारा स्त्री को लड़ाकू, हठी या अभिमानिनी बनाने के जो विचार गढ़े जा रहे हैं, वो कत्तई सच्चा स्त्री सशक्तिकरण नहीं है। वे इस अध्याय की स्त्री को देखें जो सशक्त तो है किन्तु समझदार, लचीली और धैर्यवान भी है और अपनी सशक्तता के भौंडे प्रदर्शन के लिए अपने रिश्ते की तिलांजलि नहीं देती क्योंकि, उसमे ये समझ है कि हर बात को सिर्फ स्त्री-पुरुष की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। कुल मिलाकर इस अध्याय को हासिल-ए-किताब भी कहा जा सकता है।
भाषा-शैली की बात करें तो मनीषा की भाषा काफी लचीली है, जिसमे वे बातचीत के अंदाज में अपनी बातें कहती जाती हैं। हालांकि अभी यह मनीषा की पहली किताब है तो इसमें शब्दों के प्रयोग में तनिक असावधानी दिखती है। असावधानी ये कि एक ही वाक्य में चार हल्के और सामान्य शब्दों के साथ दो भारी-भरकम शब्दों जिनका पर्याय आम बोलचाल के शब्दों में भी उपलब्ध है, का इस्तेमाल मनीषा कर गई हैं। जैसे कुछ वाक्य हैं, ‘बेफिक्र होकर अपना कर्म कर’, ‘भले लड़का कितना ही विवेकशील क्यों न हो’, ‘जीत नमक रहित पकवान की भांति’ इन वाक्यों में कर्म, विवेकशील, भांति जैसे भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग हुआ है जिनसे अर्थ पर तो नहीं लेकिन, वाक्य के प्रवाह और सौन्दर्य पर प्रभाव पड़ता है। दूसरे वाक्य में ‘विवेकशील’ की जगह समझदार शब्द रखिये तो भी अर्थ यही रहेगा लेकिन, वाक्य अधिक सहज और ग्राह्य हो जाएगा। यह लेखन का कला-पक्ष है, इसमे मनीषा को अभी जरा और काम करने की आवश्यकता है।

इसी क्रम में अगर कविताओं की बात करें तो मनीषा के पास कथ्य और भाव तो भरपूर हैं जिन्हें उन्होंने अपनी कविताओं में ठीकठाक बयाँ भी किया है। लेकिन अभी इस दिशा में उन्हें और मेहनत करने की जरूरत है। अतुकांत कविता के स्तर को गिराकर आज के रचनाकारों ने उसे जरूरत से ज्यादा आसान बना दिया है, अन्यथा उसका भी एक ढंग होता है।

चूंकि, अतुकांत कविता में लय-तुक नहीं होती, इसलिए अगर आप सावधान नहीं रहे तो वो कब गद्य बन जाएगी आपको पता भी नहीं चलेगा। इसलिए उसकी रचना के समय उसके पदों में एक अलग-सा प्रवाह रखा जाता है ताकि वो गद्य न बने और ये करना पूरी तरह से रचनाकार की सृजन क्षमता पर ही निर्भर करता है। मनीषा ने काफी हद ऐसा करने की कोशिश की है लेकिन, अभी और प्रयास की जरूरत है। साथ ही कविताओं में भी शब्दों को लेकर उन्हें उपर्युक्त प्रकार से ही सावधान रहने की जरूरत है।

बहरहाल, कुल मिलाकर ये कह सकते हैं कि मनीषा की इस गुल्लक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये अपनी बनावट (डिजाईन) में ही एकदम अलग और अनूठी है और हमें यह मानना होगा कि इस गुल्लक ने अपने आप में हिंदी साहित्य को विधागत स्तर पर और समृद्ध करने का ही काम किया है। गुल्लक के अन्दर सबके लिए कुछ न कुछ मौजूद है।

बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक किसीको भी ये गुल्लक निराश नहीं करने वाली। और चूंकि, मनीषा शहरी परिवेश में पली-बढ़ी एक प्रगतिशील लड़की रही हैं, इसलिए उनके अनुभवों से भरी ये गुल्लक कहीं न कहीं शहरी प्रगतिशील लड़कियों के अनुभवों का प्रतिनिधित्व करने की भी विशेष क्षमता रखती हैं।

संभव है कि मनीषा की इस गुल्लक से कहानी-कविता-उपन्यास में डूबे हिंदी साहित्य के समकालीन सूरमाओं को भी कुछ नया रचने की प्रेरणा मिले और वे समझें कि अभी बहुत कुछ है, जिसे रचकर हिंदी साहित्य को न केवल कथ्य के बल्कि कला और शिल्प के स्तर पर भी और समृद्ध किया जा सकता है। आखिर में, इस सुन्दर व सार्थक रचना के लिए मनीषा को ढेरों बधाइयां.!

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